Wednesday, May 1, 2013

"वो कौन है"

वो जो कहता है दोस्त मुझे
कभी अपना ना था, और
ये दोस्त होकर भी
पराया क्यूँ लगता मुझे ........

ये तो  नजरें मिलाकर  भी
फेर लेता है ऑंखें, और
वो जो  ऑंखें ही नहीं मिलाता
नजरों में बस गया है।

दिल धड़कता तो है
न जाने ये धड़कन है किसकी 
उसकी, जिसका दिल ही नहीं
या वो जो  मेरा नहीं ......

मुश्किल है ये बता पाना
कौन अपना कौन पराया
वो जो  नजरें मिलाता है, या
फिर वो जो नजरें छिपाए बैठा है।


  1. Read this today...made me cry. felt like you have given words to my own feelings...

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    2. Yes Bhaiya. That's what we have to tell ourselves every single day...that life goes on. You think and you wish you'll die of grief, but the pulse, obdurate, keeps its rhythm. You think you cannot keep breathing, but the ribcage has other ideas, rising and falling. You have to thrive, in spite of yourself, and so that you may do it, God takes out your heart of flesh, and gives you a heart of stone.